क्यों और कैसे मनाई जाती है Lohri और दुल्ला भट्टी की कहानी का महत्व

पंजाब का सबसे प्रसिद्ध त्योहार है लोहड़ी (Lohri) . इस दिन सभी अपने घरों और चौराहों के बाहर लोहड़ी (Lohri) जलाते हैं. आग का घेरा बनाकर दुल्ला भट्टी की कहानी सुनाते हुए रेवड़ी, मूंगफली और लावा खाते हैं. लेकिन आपको मालूम है कि ये लोहड़ी (Lohri) क्यों जलाई जाती है और इस दिन दुल्ला भट्टी की कहानी का क्या महत्व है. चलिए बताते हैं
लोहड़ी (Lohri) भारतीय संस्कृति में छोटी- छोटी खुशियों का संग्रह है जिंदगी। मनुष्य ने मौसम, दिन, वातावरण, रीति- रिवाज, रिश्ते-नाते, प्यार -मोहब्बत, लगाव तथा परंपराओं आदि को ध्यान में रखते हुए हर्ष और उल्लास के अवसर के रूप में मेलों और त्योहारों का आयोजन शुरू किया। इन्हीं सब वजहों से हमारे त्योहार अस्तित्व में आए। अगर मनुष्य की जिंदगी से इन उत्सवपूर्ण दिनों को हटा दिया जाए तो उसकी सामाजिक जिंदगी बेहद नीरस और फीकी हो जाएगी।

मैंने महाराष्ट्र ,पंजाब, हिमाचल ,उत्तराखंड ,तमिलनाडु आदि प्रान्तों का मकरसंक्रांति लोहड़ी (Lohri) का उत्सव देखने का अवसर मिला है ।
लोहड़ी (Lohri) शब्द लोही से बना है, जिसका अभिप्राय है वर्षा होना, फसलों का फूटना। एक लोकोक्ति है कि अगर लोहड़ी (Lohri) के समय वर्षा न हो तो खेती का नुकसान होता है। इस तरह यह त्योहार बुनियादी तौर पर मौसम के बदलाव तथा फसलों के बढ़ने से जुड़ा है। इस समय तक किसान हाड़ कंपाने वाली सर्दी में अपने जुताई-बुवाई जैसे सारे फसली काम कर चुके होते हैं। अब सिर्फ फसलों के बढ़ने और उनके पकने का इंतजार करना होता है। इसी समय से सर्दी भी घटने लगती है। इसलिए किसान इस त्योहार के माध्यम से इस सुखद, आशाओं से भरी परिस्थितियों को सेलिब्रेट करते हैं। पंजाब कृषि प्रधान राज्य है, वहां लोढ़ी किसानों, जमींदारों एवं मजदूरों की मेहनत का पर्याय है। वहां इसे सबसे ज्यादा धूमधाम से मनाते हैं।

लोहड़ी (Lohri) माघ महीने की संक्रांति से पहली रात को मनाई जाती है। किसान सर्द ऋतु की फसलें बो कर आराम फरमाता है। इस दिन प्रत्येक घर में मूंगफली, रेवड़ियां, चिवड़े, गजक, भुग्गा, तिलचौली, मक्की के भुने दाने, गुड़, फल इत्यादि खाने और बांटने के लिए रखे जाते हैं। गन्ने के रस की खीर बनाई जाती है और उसे दही के साथ खाया जाता है। ये सारी चीजें इसी मौसम की उपज होती हैं और अपनी तासीर से शरीर को गर्मी पहुंचाती हैं।

इस दिन घरों के आंगनों, संस्थाओं, गलियों, मुहल्लों, बाजारों में खड़ी लकड़ियों के ढेर बना कर या उपलों का ढेर बना कर उस की आग जलाते हैं और उसे सेंकने का लुत्फ लेते हैं। चारों ओर बिखरी सर्दी तथा रुई की भांति फैली धुंध में आग सेंकने और उसके चारों ओर नाचने-गाने का अपना ही आनंद होता है। लोग इस आग में भी तिल इत्यादि फेंकते हैं। घरों में पूरा परिवार बैठकर हर्ष की अभिव्यक्ति के लिए गीत गायन करता है। देर रात तक ढोलक की आवाज, ढोल के फड़कते ताल, गिद्दों-भंगड़ों की धमक तथा गीतों की आवाज सुनाई देती रहती है। रिश्तों की सुरभि तथा आपसी प्यार का नजारा चारों ओर देखने को मिलता है। एक संपूर्ण खुशी का आलम।

इस त्योहार से कुछ दंतकथाएं भी आ जुड़ी हैं। एक कहानी यह है कि दुल्ला भट्टी नाम का एक मशहूर डाकू था। उसने एक निर्धन ब्राह्माण की दो बेटियों -सुंदरी एवं मुंदरी को जालिमों से छुड़ा कर उन की शादियां कीं तथा उन की झोली में शक्कर डाली। इसका एक संदेश यह है कि डाकू हो कर भी उसने निर्धन लड़कियों के लिए पिता का फर्ज निभाया। दूसरा संदेश यह है कि यह इतनी खुशी और उमंग से भरा त्योहार है कि कोई चोर- डकैत जैसा भी अपनी गलत आदतें छोड़ कर दूसरों की खुशी के लिए आगे बढ़ कर आ जाता है।

लोहड़ी (Lohri) के दूसरे दिन ‘माघी’ का पवित्र त्योहार मनाया जाता है। माघ माह को शुभ समझा जाता है। ठिठुरती सर्दी में रजाई का आनंद इसी महीने आता है। इस मौसम में चावल की खिचड़ी, सरसों का साग, मक्की की रोटी और मक्खन खाने का भी रिवाज है, जो शरीर की अनुकूलता से संबंधित है।

‘ माघी’ का मेला अनेक शहरों में मनाया जाता है, खास कर मुक्तसर (पंजाब) में। सिखों के पांचवें गुरु श्री अर्जुन देव जी ने माघ माह की ‘बारह माह बाणी’ में प्रशंसा की है। माघ से लेकर बाद का छह माह का समय ‘उत्तरायणम’ कहलाता है, जिस में ब्रह्मा को जानने वाले लोग प्राणों का त्याग कर मुक्त हो जाते हैं। प्रयाग तीर्थ में महात्मा लोग प्रकल्प करते हैं। लोहड़ी (Lohri) का त्योहार सिर्फ भारत में ही नहीं, विदेशों में भी धूमधाम से मनाया जाता है।
लोहड़ी (Lohri) किसके लिए है खास क्या क्या परम्पराये कहानियां जुडी है इस त्यौहार से आज जाने उनको ।

लोहड़ी (Lohri) का त्योहार 13 जनवरी को मनाया जाएगा। शादी के बाद जिनकी पहली लोहड़ी (Lohri) होती है या जिनके घर संतान का जन्म होता है उनके लिए लोहड़ी (Lohri) का त्योहार बड़ा खास होता है।

लोहड़ी (Lohri) को सूर्य के दक्षिणायन से उत्तरायण में आने का स्वागत पर्व भी माना जाता है। यह त्योहार पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, हिमाचल एवं कश्मीर में धूम धाम से मनाया जाता है।

लोहड़ी (Lohri) पर लड़कियों को उपहार
लोहड़ी (Lohri) के मौके पर कन्या के मायके से लड़की की मां कपड़े, मिठाईयां, गजक, रेवड़ी अपनी बेटी के लिए भेजती है। यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है।

माना जाता है कि जब दक्ष प्रजापति ने अपने दामाद भगवान शिव का अपमान किया और पुत्री सती का निरादर किया तो क्रोधित सती ने आत्मदाह कर लिया।

इसके बाद दक्ष को इसका बड़ा दंड भुगतना पड़ा। दक्ष की गलती को सुधारने के लिए ही माताएं लोहड़ी (Lohri) के मौके पर पुत्री को उपहार देकर दक्ष द्वारा किए अपराध का प्रायश्चित करती हैं।

लोहड़ी (Lohri) के मौके पर होलिका दहन की तरह लकड़ियों एवं उपलों ढ़ेर बनाया जाता है। शाम के समय लकड़ियों को जलाकर सभी लोग आग के चारों ओर नाचते गाते हैं।
माताएं अपने छोटे बच्चों को गोद में लेकर लोहड़ी (Lohri) की आग ताप्ती है उनका मनमानना है की इस आग से बच्चों का स्वास्थ्य सबसे बढ़िया रहता है
लोहड़ी (Lohri) के खाद्य ब्यञ्जन और पकवान

लोहड़ी (Lohri) मूंगफली और गजक
पवित्र अग्नि में लोग रवि फसलों को अर्पित करते हैं। क्योंकि इस समय रवि फसलें कटकर घर आने लगती हैं। हिन्दू शास्त्रों की मान्यता है कि, अग्नि में समर्पित की गयी सामग्री यज्ञ भाग बनकर देवताओ तक पहुंच जाती है।

लोहड़ी की पवित्र अग्नि में रेवड़ी, तिल, मूँगफली, गुड़ व गजक भी अर्पित किए जाते हैं। इस तरह से लोग सूर्य देव और अग्नि के प्रति आभार प्रकट करते हैं क्योंकि उनकी कृपा से कृषि उन्नत होती है। सूर्य और अग्नि देव से प्रार्थना की जाती है कि आने वाले साल में भी कृषि उन्नत हो और घर अन्न धन से भरा रहे।

हमारे ऋषि-मनीषी भी बताते है की लोहड़ी (Lohri) पर्व के नाम के विषय में भगवान श्री कृष्ण से जुड़ी कथा प्रचलित है। कथा के अनुसार मकर संक्रांति की तैयारी में सभी गोकुलवासी लगे थे। इसी समय कंस ने लोहिता नामक राक्षसी को भगवान श्री कृष्ण को मारने के लिए भेजा लेकिन भगवान श्री कृष्ण ने लोहिता के प्राण हर लिये। इस उपलक्ष में मकर संक्रांति से एक दिन पहले लोहरी पर्व मनाया जाता है। लोहिता के प्राण हरण की घटना को याद रखने के लिए इस पर्व का नाम लोहड़ी (Lohri) रखा गया।

यदि भारत की संस्कृति को कोई व्यक्ति जान गया तो सम्पूर्ण भारत को जान गया । मैं नासिक कुम्भ में इस बार गया था और काफी बिदेशी महिलाओ को देखा । सभी प्रान्तों के लोग कुम्भ ने आते है इसलिए वह सबकी फोटो ग्राफी और फ़िल्म बना रही थी विदेशी पर्यटक तभी ही हमारे उत्सवो में भारत सैर पर आते है ।
आओ अब बात करते है बिभिन्न प्रान्त कैसे जोड़ते है भारतीय संस्कृति को । कैसे कैसे मानते है इस त्यौहार मकरसंक्रांति लोहड़ी (Lohri) को ।
पंजाब प्रान्त सबसे मशहूर माना जाता है लोहड़ी (Lohri) के लिए । लोहड़ी (Lohri) की धूम देखनी हो तो गेहूं उत्पादन में देश में खास स्थान रखने वाले पंजाब से बेहतर भला और कौन सा प्रान्त हो सकता है। अच्छी फसल होने की खुशी में ढोल नगाड़ों पर झूमते पुरूष और रंग बिरंगे दुपट्टे लहराते हुए गिददा करती महिलाएं भारत की सांस्कृतिक विविधता में चार चांद लगा देती हैं।

कुछ लोग रोजी रोटी और व्यवसाय के सिलसिले में शहरो में रहते है लेकिन लोहड़ी (Lohri) का पर्व उन्हें पुराणी यादो को ताजा करने के लिए उनके गांव ले जाता है। कुछ कहते हैं गेहूं की फसल अक्टूबर में बोई जाती है और मार्च अप्रैल तक पक कर तैयार हो जाती है। लेकिन जनवरी में संकेत मिल जाता है कि फसल अच्छी हो रही है या नहीं। अच्छी फसल का संकेत मिल जाए तो किसानों के लिए इससे बड़ा जश्न और कोई नहीं होता। यह खुशी वह लोहड़ी (Lohri) में जाहिर करते हैं।
इस पर्व के दौरान किसान यह कह कर सूर्य भगवान का आभार व्यक्त करते हैं कि उनकी गर्मी से अच्छी फसल हुई। इसीलिए इस पर्व का संबंध सूर्य से माना जाता है। लोहड़ी (Lohri) जाड़े की विदाई का भी संकेत होता है। माना जाता है कि लोहड़ी (Lohri) के अगले दिन से सूर्य मकर राशि यानी उत्तरी गोलार्ध में प्रवेश करता है। सूर्य की यह अवस्था 14 जनवरी से 14 जुलाई तक रहती है और इसे उत्तरायण कहा जाता है।

धारणा है कि सम्राट अकबर के शासनकाल के दौरान पंजाब में दुल्ला भटटी नामक एक मुस्लिम लुटेरा था जो लूट में मिले धन से गरीबों की मदद करता था। इसीलिए उसे लोग नायक मानते थे। लोहड़ी (Lohri) के लिए लकडियां एकत्र करते समय दुल्ला भट्टी की प्रशंसा में ही गीत गाए जाते हैं।

उन्होंने कहा एकत्र की गई लकडियां रात को जलाई जाती हैं और इसके आसपास लोग परिक्रमा करते हैं। इन लकडियों के नीचे गोबर से बनी लोहड़ी (Lohri) की प्रतिमा रखी जाती है। एक तरह से यह भरपूर फसल के लिए अग्नि की पूजा होती है।

कुछ बुजुर्ग कहते है कि परिक्रमा के दौरान लोग आग में तिल और सूखा गन्ना डालते हैं। परिवार के छोटे सदस्य बड़ों के चरण स्पर्श कर उनसे आशीर्वाद लेते हैं। नवविवाहित जोड़ों और नवजात शिशु के लिए इस पर्व को अत्यंत शुभ और महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दिन मायके और ससुराल दोनों जगहों से उपहार मिलते हैं। नवजात शिशु को बुजुर्ग कंघा भेंट करते हैं। इस सौभाग्यसूचक माना जाता है। यह नजारा शहरों में कहां देखने मिलता है।

लोहड़ी (Lohri) पर पूजा के बाद गजक, गुड़, मूंगफली, फुलियां, पॉपकॉर्न का प्रसाद चढ़ाया जाता है। इस दिन मक्की की रोटी और सरसों का साग बनाने की परंपरा है।

चंद्रमा आधारित कैलेंडर का आखिरी महीना मारगजी लोहड़ी (Lohri) के दिन समाप्त हो जाता है। पहले यह पर्व केवल उत्तर भारत में मनाया जाता था लेकिन अब पूरे देश में इसकी धूम मचती है। हां, अलग अलग प्रदेशों में इसके नाम अलग अलग होते हैं। तमिलनाडु में इसे पोंगल, असम में बीहू, आंध्र प्रदेश में भोगी तथा कर्नाटक, बिहार और उत्तर प्रदेश में इसे संक्रान्ति कहा जाता है।

पंजाब हिमाचल में इस त्यौहार को जो खिचड़ी बनायीं जाती है जिसने हरे मुंग अदरख कालीमिर्च सेंधा नमक अपने खेत से धान से तैयार चावल और मिटटी की हांड़ी । और ऊपर से माँ के हाथो का घी इतना स्वाद ,अच्छा लगता है कि पूछो ही मत ।
यदि आप लोगों को सच में लोहड़ी (Lohri) मनानी है तो उत्तर भारत पंजाब ,हिमाचल ,हरियाणा के गाँव में ही सबसे बढ़िया है । मध्यभारत में जन्मदिन मनाने की परम्परा मुझे सबसे अच्छी लगी । इसे कहते है विविधा में एकता कभी बचपन में पढ़ते थे विविधता में एकता भारत देश में है आज हम स्वयं देख पा रहे है इन उत्सवो के माध्यमो से ।


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